भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Council Act) 1861

भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Council Act) 1861
1857 के महान विद्रोह के बाद, ब्रिटिश सरकार ने भारत के प्रशासन में भारतीयों के सहयोग की आवश्यकता महसूस की. उनकी इस नीति के अनुसरण में, 1861 का भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Council Act), भारत के संवैधानिक और राजनीतिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ.

भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Council Act) 1861 की विशेषताएं
1. इस अधिनियम से भारतीयों को कानून बनाने की प्रक्रिया से जोड़कर प्रतिनिधि संस्थानों की शुरुआत हुई. इस प्रकार यह कहा गया कि वायसराय को कुछ भारतीयों को अपनी विस्तारित परिषद के गैर-आधिकारिक सदस्यों के रूप में नामित करना होगा. 1862 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों को विधान परिषद में नामित किया - बनारस के राजा देव नारायण सिंह, पटियाला के महाराजा नरेन्द्र सिंह और सर दिनकर राव.

2. इस अधिनियम ने बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसी की विधायी शक्तियां बहाल कर दी. इससे वाइसराय की शक्तियों के विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई. इस प्रकार इसने केन्द्रीयकारण की निति को उलट दिया जो 1773 के विनियमन अधिनियम से शुरू हुई थी और 1833 के चार्टर अधिनियम के तहत चरमोत्कर्ष पर पहुंच गयी थी. इस अधिनियम के चलते ही, आगे 1937 में प्रांतों को लगभग पूर्ण आंतरिक स्वायत्तता मिली.

3. इस अधिनियम ने बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत (NWFP) और पंजाब के लिए नई प्रांतीय विधान परिषदों की स्थापना का प्रावधान रखा, जिनकी स्थापना क्रमशः 1862, 1866 और 1897 में हुई. और वाइसराय को ही प्रांतीय गवर्नर चुनने और नियुक्त करने का अधिकार दिया.

4. इस अधिनियम ने वायसराय परिषद में व्यापार के अधिक सुविधाजनक लेनदेन के लिए नियम और आदेश बनाने का अधिकार दिया. इसने 1859 में लॉर्ड कैनिंग द्वारा शुरू की गई 'पोर्टफोलियो' प्रणाली को भी मान्यता दी. जिसके तहत, वायसराय की परिषद के एक सदस्य को सरकार के एक या एक से अधिक विभागों का प्रभारी बनाया गया और वाइसराय की ओर से अपने विभाग के मामलों पर अंतिम आदेश जारी करने के लिए अधिकृत किया.

5. इस अधिनियम ने वायसराय को आपातकाल के दौरान, विधान परिषद की सहमति के बिना, अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी. ऐसे अध्यादेश का जीवन छह महीने था.